GRAMG योजना फेल मजदूरों का फूटा गुस्सा, हाजिरी नहीं लगी तो मनरेगा कार्य का किया बहिष्कार


भाटापारा-सुहेला।  सरकार भले ही डिजिटल इंडिया और तकनीक के माध्यम से योजनाओं को पारदर्शी बनाने का दावा कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर बयां कर रही है। ग्राम बिटकुली में आज मनरेगा कार्य के दौरान GRAMG (ऑनलाइन उपस्थिति) प्रणाली पूरी तरह फेल होती नजर आई, जिसके चलते मजदूरों और ग्रामीणों में भारी नाराजगी देखने को मिली।



जानकारी के अनुसार ग्रामीण सुबह से निर्धारित कार्यस्थल पर पहुंचे और नियमानुसार काम शुरू किया। मजदूरों ने मेहनत से कार्य किया, लेकिन जब उपस्थिति दर्ज करने का समय आया तो जिरामजी ऐप ने जवाब दे दिया। किसी मजदूर की हाजिरी लग रही थी तो किसी की नहीं। कई मजदूरों के बार-बार प्रयास के बावजूद उनकी उपस्थिति दर्ज नहीं हो सकी।



इस अव्यवस्था से नाराज ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से विरोध दर्ज कराया और साफ शब्दों में कहा कि यदि तकनीकी व्यवस्था मजदूरों की हाजिरी दर्ज नहीं कर पा रही है तो ऐसे सिस्टम का कोई औचित्य नहीं है। ग्रामीणों का कहना था कि पहले जिस प्रकार उपस्थिति दर्ज की जाती थी, उसी व्यवस्था को लागू किया जाए ताकि मजदूरों को अपनी मजदूरी के लिए परेशान न होना पड़े।

ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि जब मजदूर पूरे दिन मेहनत कर रहे हैं तो उनकी मजदूरी का आधार बनने वाली उपस्थिति किसी तकनीकी खराबी की भेंट क्यों चढ़ रही है? यदि ऐप काम नहीं करेगा तो मजदूरों के हक का पैसा कौन दिलाएगा? क्या सरकार के पास ऐसी स्थिति से निपटने के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है?

विरोध बढ़ने के बाद अंततः मौके पर मौजूद मेट और जिम्मेदार कर्मचारियों को कागज-पेन के माध्यम से मजदूरों की उपस्थिति दर्ज करनी पड़ी। इसके बाद ही स्थिति सामान्य हो सकी। हालांकि ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि यदि भविष्य में भी यही स्थिति बनी रही तो मजदूर कार्यस्थल पर आने से परहेज करेंगे।

ग्रामीणों का कहना है कि सरकार द्वारा 125 दिनों तक रोजगार उपलब्ध कराने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति बिल्कुल अलग है। उनका आरोप है कि अधिकांश मजदूरों को सालभर में मुश्किल से 10 से 15 दिन ही काम मिल पाता है। ऐसे में जो काम मिल रहा है, उसमें भी यदि हाजिरी दर्ज नहीं होगी तो मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार की गई डिजिटल व्यवस्था आखिर गांवों में क्यों दम तोड़ रही है? यदि तकनीक मजदूरों के अधिकारों की रक्षा करने के बजाय उनके हक की मजदूरी पर संकट खड़ा कर रही है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

आज ग्राम बिटकुली में जो हुआ उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बिना पर्याप्त तैयारी और मजबूत तकनीकी ढांचे के डिजिटल प्रयोगों को ग्रामीण भारत पर थोपना उचित है? मजदूरों की मांग साफ है। पहले व्यवस्था को दुरुस्त कीजिए, फिर उसे लागू कीजिए। क्योंकि सिस्टम की गलती का खामियाजा गरीब मजदूर नहीं भुगत सकता।

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